गुरुवार व्रत करने से बृहस्पति देवता प्रसन्न होते हैं। यह व्रत अत्यंत फलदायी है। अग्निपुराण के अनुसार अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार से आरंभ करके 7 गुरुवार व्रत करने से बृहस्पति ग्रह की हर पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥
प्राचीन काल में भारतवर्ष एक धार्मिक और उदार राजा का शासन था। वह प्रतिदिन ब्राह्मणों और निर्धनों को दान देता, जिससे उसका राज्य समृद्ध था। लेकिन उसकी रानी दान-पुण्य से घृणा करती। वह न पूजा करती, न दान देती और राजा को भी रोकती।
कथा का प्रारंभिक भाग: रानी का निरादर
एक बार राजा शिकार को जंगल गया। महल में अकेली रानी के पास साधु वेश में बृहस्पतिदेव भिक्षा मांगने आए। रानी ने इंकार कर दिया और बोली, “महाराज, दान से तंग आ चुकी हूं। पति सारा धन लुटाते हैं। काश, यह सब नष्ट हो जाए, ताकि बांस न रहे तो बांसुरी न बजे।”
साधु ने समझाया, “देवी, धन सबका इच्छित है। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी निवास करते हैं। अधिक धन हो तो भूखों को अन्न दो, प्यासों के लिए कूप बनवाओ, यात्री-धर्मशालाएं खोलो, कन्या-विवाह कराओ। इससे यश फैलेगा।”
लेकिन रानी न मानी। साधु बोले, “तथास्तु! बृहस्पतिवार को पीली मिट्टी से स्नान करो, घर लीपो, भट्टी चढ़ाकर कपड़े धोओ। इससे धन नष्ट हो जाएगा।” कहकर वे अंतर्धान हो गए।
रानी ने तीन गुरुवार ऐसा किया, तो समस्त संपत्ति नष्ट हो गई। परिवार भूखा रहने लगा। राजा बोले, “रानी, मैं परदेश जाऊंगा, यहां मुझे कोई छोटा काम न देगा।” वे चले गए, जंगल से लकड़ी काटकर बेचने लगे।
संकट की घड़ी: रानी की बहन का आगमन
रानी और दासी भूखी रहीं। सात दिन बिना अन्न के गुजारे। रानी ने दासी को बहन के पास भेजा, जो धनी थी। उस दिन गुरुवार था, बहन कथा सुन रही थी। दासी ने संदेश दिया, लेकिन बहन चुप रहीं। दासी क्रुद्ध होकर लौटी।
कथा समाप्त कर बहन आई, बोली, “गुरुवार व्रत में कथा के समय बोलना वर्जित है। कहो, दासी क्यों आई?” रानी रोई, “बहन, अनाज नहीं बचा। सात दिन भूखे रहे।” बहन बोली, “बृहस्पतिदेव मनोकामनाएं पूरी करते हैं। देखो, शायद अनाज आ गया हो।“
दासी ने देखा, घड़ा अनाज से भरा! आश्चर्य से दासी बोली, “रानी, भोजन न मिले तो व्रत ही तो है। विधि पूछ लो।” बहन ने बताया, “चना-मुनक्का से विष्णु पूजन, केले की जड़ में दीप जलाओ, पीला भोजन करो।”
व्रत की कृपा: धन की वापसी
अगले गुरुवार रानी-दासी ने व्रत किया, पूजन किया। पीला भोजन न था, तो दुखी हुईं। बृहस्पतिदेव साधारण रूप में दो थाल पीला भोजन लाए। प्रसन्न होकर खाया। नियमित व्रत से धन लौटा, लेकिन रानी फिर आलसी हुई।
दासी ने समझाया, “मुसीबतों के बाद धन मिला, अब दान-पुण्य करो। भूखों को अन्न दो, शुभ कार्यों में खर्च करो। यश बढ़ेगा, पितर प्रसन्न होंगे।” रानी मानी, दान करने लगी, यश फैला।
राजा का परिक्षण: जंगल में साधु का दर्शन
एक गुरुवार राजा (लकड़हारा) जंगल में दुखी बैठा। बृहस्पतिदेव साधु रूप में आए, बोले, “चिंता क्यों?” राजा ने कथा सुनाई। साधु बोले, “रानी ने मेरा निरादर किया, इसलिए यह दशा। अब व्रत-कथा करो। चना-गुड़ प्रसाद बनाओ, शक्कर अमृत तैयार करो, बांटो। मनोकामनाएं पूरी होंगी।”
राजा बोले, “पैसे कम हैं।” साधु बोले, “अगले गुरुवार दोगुना धन मिलेगा।” वे गायब हो गए। अगले दिन लकड़ियां अच्छे दाम बिकीं, व्रत किया। क्लेश दूर हुए।
लेकिन एक गुरुवार व्रत भूल गया। बृहस्पतिदेव नाराज। उस नगर के राजा ने यज्ञ किया, घोषणा: “घर पर भोजन-अग्नि न जलाओ, सब महल में भोजन करो, अन्यथा फांसी।”
कारावास और मुक्ति
सभी गए, लकड़हारा (राजा) देर से पहुंचा। नगर राजा ने घर ले लिया। रानी को हार गायब लगा, सोचा चोर है, सिपाहियों से कारागार डलवाया।
कारागार में राजा ने साधु स्मरण किया, व्रत किया, कथा सुनी। बृहस्पतिदेव प्रसन्न, स्वप्न में नगर राजा को कहा, “यह निर्दोष, छोड़ दो।” सुबह रिहा किया गया। राजा को धन-समृद्धि मिली।
धीरे-धीरे राजा स्वदेश लौटा। रानी गर्भवती थी। बहन बधाई देने आई। रानी ने व्यंग्य किया, “घोड़े पर न चढ़ी, गधे पर आई?” बहन बोली, “ऐसा न कहती तो पुत्र कैसे मिलता? बृहस्पतिदेव मन की कामना पूरी करते हैं।“
मुख्य लाभ
- धन-समृद्धि की प्राप्ति: व्रत से लक्ष्मी की कृपा होती है, गरीबी का अंत होता है।
- ग्रह पीड़ा से मुक्ति: बृहस्पति दोष निवारण के लिए सर्वोत्तम।
- पारिवारिक सुख: संतान प्राप्ति और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है।
- पुण्य लाभ: दान-पुण्य से यश और स्वर्ग की प्राप्ति।
- मानसिक शांति: आलस्य और नकारात्मकता दूर होती है, सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
श्री बृहस्पति देव की आरती
जय वृहस्पति देवा,
ऊँ जय वृहस्पति देवा ।
छिन छिन भोग लगाऊँ,
कदली फल मेवा ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी ।
जगतपिता जगदीश्वर,
तुम सबके स्वामी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
चरणामृत निज निर्मल,
सब पातक हर्ता ।
सकल मनोरथ दायक,
कृपा करो भर्ता ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
तन, मन, धन अर्पण कर,
जो जन शरण पड़े ।
प्रभु प्रकट तब होकर,
आकर द्घार खड़े ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
दीनदयाल दयानिधि,
भक्तन हितकारी ।
पाप दोष सब हर्ता,
भव बंधन हारी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
सकल मनोरथ दायक,
सब संशय हारो ।
विषय विकार मिटाओ,
संतन सुखकारी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
जो कोई आरती तेरी,
प्रेम सहित गावे ।
जेठानन्द आनन्दकर,
सो निश्चय पावे ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा,
जय वृहस्पति देवा ॥
सब बोलो विष्णु भगवान की जय ।
बोलो वृहस्पतिदेव भगवान की जय ॥






