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Geet Govind Lyrics in Hindi: जयदेव की अमर भक्ति रचना | पूर्ण अष्टपदियाँ और अर्थ

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अगर आप भक्ति के रस में डूबना चाहते हो, तो गीत गोविन्द से बेहतर क्या हो सकता है? यह काव्य रचना तुम्हें राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम की दुनिया में ले जाती है. जयदेव की यह अमर रचना सदियों से भक्तों के दिलों को छू रही है. तुम्हें पता है, गीत गोविन्द लिरिक्स की खोज में कितने लोग रोजाना लगे रहते हैं? क्योंकि यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं का सागर है. इसमें कृष्ण की लीलाएं, राधा का विरह और मिलन का उत्सव सब कुछ समाहित है. आप इसे पढ़ोगे तो महसूस करोगे कि भक्ति कितनी गहरी हो सकती है.

इस काव्य की सुंदरता यह है कि यह संस्कृत में रचा गया, लेकिन हिंदी अनुवाद में भी उतना ही मधुर लगता है. तुम जब इसे गुनगुनाओगे, तो लगेगा जैसे वृंदावन की गलियों में घूम रहे हो. जयदेव ने इसे ऐसे बुना है कि हर पंक्ति में प्रेम की झलक मिलती है. अगर तुम नये हो इस रचना से, तो चिंता मत करो. हम इसे विस्तार से समझेंगे।

जयदेव और गीत गोविन्द की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

तुम कल्पना करो, 12वीं शताब्दी का भारत. उस समय भक्ति आंदोलन जोरों पर था. जयदेव, जो बंगाल या ओडिशा के रहने वाले थे, ने गीत गोविन्द की रचना की. वे एक महान कवि थे, जिनका जीवन भगवान जगन्नाथ की भक्ति में बीता. कुछ कथाओं के अनुसार, जयदेव जगन्नाथ मंदिर से जुड़े थे और उनकी पत्नी पद्मावती नृत्य करती थीं. तुम सोचो, ऐसी पृष्ठभूमि में रचा गया काव्य कितना दिव्य होगा.

गीत गोविन्द का उद्देश्य साफ है – राधा और कृष्ण के प्रेम के माध्यम से भक्ति का प्रसार. यह रचना कृष्ण की लीलाओं को इतने भावपूर्ण तरीके से वर्णित करती है कि पढ़ने वाला खुद को उसमें खो देता है. जयदेव ने इसे ऐसे लिखा जैसे कृष्ण खुद बोल रहे हों. तुम्हें पता चलेगा कि यह काव्य ओडिशा के पुरी मंदिर में आज भी गाया जाता है. भक्ति भाव से भरा यह ग्रंथ तुम्हारे मन को शांति देगा. इसमें विरह की पीड़ा और मिलन की खुशी दोनों का संतुलन है.

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कुछ स्रोत बताते हैं कि जयदेव का जन्म केंदुबिल्व गांव में हुआ था. वे वैष्णव परंपरा से जुड़े थे. गीत गोविन्द ने भक्ति साहित्य को नई दिशा दी. तुम अगर इतिहास में रुचि रखते हो, तो समझोगे कि यह रचना मध्यकालीन भारत की सांस्कृतिक धरोहर है. प्रेम और भक्ति का ऐसा मिश्रण कहीं और मिलना मुश्किल.

Geet Govind Lyrics in Hindi | गीत गोविन्द लिरिक्स हिंदी में

श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥

दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए।
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे ॥

कालियविषधरगंजन जनरंजन ए।
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ॥

मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए।
सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ॥

अमलकमलदललोचन भवमोचन ए।
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ॥

जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए।
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ॥

अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए।
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ॥

तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए।
कुरु कुशलंव प्रणतेषु जय जय देव हरे ॥

श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम् ।
मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे ॥

राधे कृष्णा हरे गोविंद गोपाला नन्द जू को लाला ।
यशोदा दुलाला जय जय देव हरे ॥

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गीत गोविन्द की संरचना

गीत गोविन्द की संरचना बड़ी अनोखी है. इसमें 12 सर्ग हैं, जो chapters की तरह हैं. प्रत्येक सर्ग में प्रबंध या अष्टपदियाँ हैं – कुल 24 अष्टपदियाँ. हर अष्टपदी में 8 पद होते हैं, इसलिए नाम अष्टपदी. तुम सोचो, कितनी व्यवस्थित रचना. मुख्य थीम राधा-कृष्ण का प्रेम है, लेकिन इसमें कृष्ण की अवतार लीलाएं भी शामिल हैं.

पहला सर्ग दशावतार पर केंद्रित है. फिर आते हैं विरह के दृश्य, जहां राधा कृष्ण की प्रतीक्षा करती है. मिलन के सर्गों में उत्सव का माहौल है. गोपियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. तुम जब इसे पढ़ोगे, तो हर सर्ग में नया रस मिलेगा. यह काव्य संगीत के लिए बना है, इसलिए इसे गाकर सुनना अलग मजा देता है. भक्ति संगीत में इसकी जगह अटल है.

संरचना में संस्कृत की छंदबद्धता है, जो हिंदी अनुवाद में भी बनी रहती है. तुम देखोगे कि प्रत्येक अष्टपदी के अंत में “जय जय देव हरे” जैसा रेफ्रेन आता है. यह रचना नृत्य के लिए भी उपयुक्त है, जैसे ओडिसी नृत्य में इस्तेमाल होता है.

गीत गोविन्द का महत्व और उपयोग

भक्ति संगीत में भूमिका

तुम जानते हो, गीत गोविन्द भक्ति संगीत का आधार है. इसे संकीर्तन में गाया जाता है, नृत्य में इस्तेमाल होता है. ओडिसी डांस में इसकी अष्टपदियाँ जीवंत हो जाती हैं. आधुनिक समय में इन्द्रेश उपाध्याय जी या गोविंद कृष्ण दास जैसे कलाकार इसे गाते हैं. तुम यूट्यूब पर सुनोगे तो मन शांत हो जाएगा.

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यह रचना मंदिरों में रोजाना गाई जाती है, खासकर जगन्नाथ मंदिर में. तुम अगर भजन सुनते हो, तो यह तुम्हारी प्लेलिस्ट में होना चाहिए. संगीत के साथ लिरिक्स का संयोजन दिव्य है.

सांस्कृतिक प्रभाव

ओडिशा और बंगाल में गीत गोविन्द उत्सवों का हिस्सा है. रथयात्रा में इसे गाते हैं. अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं, जैसे बंगाली या अंग्रेजी. तुम देखोगे कि यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है. प्रेम और भक्ति का संदेश आज भी प्रासंगिक है.

यह रचना न सिर्फ धार्मिक, बल्कि साहित्यिक महत्व रखती है. तुम अगर कला प्रेमी हो, तो इसके प्रभाव को समझोगे.

F.A.Q

गीत गोविन्द क्या है?

यह जयदेव द्वारा रचित संस्कृत काव्य है, जो राधा-कृष्ण प्रेम पर आधारित है. 12 सर्गों में भक्ति का वर्णन.

गीत गोविन्द के लिरिक्स हिंदी में कहाँ मिलेंगे?

तुम ऑनलाइन वेबसाइट्स या किताबों में पा सकते हो. मुख्य अष्टपदियाँ ऊपर दी गई हैं.

जयदेव ने गीत गोविन्द क्यों लिखा?

भक्ति प्रसार और राधा-कृष्ण प्रेम को व्यक्त करने के लिए. यह उनकी आध्यात्मिक यात्रा का हिस्सा था.

गीत गोविन्द में कितनी अष्टपदियाँ हैं?

कुल 24 अष्टपदियाँ, 12 सर्गों में बंटी हुईं.

क्या गीत गोविन्द और गोपी गीत एक ही हैं?

नहीं. गोपी गीत भागवत पुराण से है, जबकि गीत गोविन्द जयदेव की रचना है.

Wrapping Up

तुमने गीत गोविन्द के बारे में इतना पढ़ा, अब इसे अपनाने का समय है. यह लिरिक्स तुम्हारे जीवन में भक्ति का रंग भर देंगे. आगे पढ़ने के लिए पूर्ण किताबें या वीडियो देखो. जय जय देव हरे!