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Sunderkand Ka Paath: संपूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी में, जामवंत के बचन सुहाए, सुनि हनुमंत हृदय अति भाए…

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sunderkand ka paath

सुंदरकांड रामचरितमानस का वह हिस्सा जो हनुमान जी की अद्भुत वीरता से भरा पड़ा है, आपके जीवन में कितनी सकारात्मक ऊर्जा ला सकता है? सुंदरकांड रामचरितमानस का पांचवां सोपान है, जहां तुलसीदास जी ने हनुमान जी के लंका यात्रा और सीता जी की खोज का वर्णन किया है। यह हिस्सा न केवल रामायण की कथा को आगे बढ़ाता है, बल्कि भक्ति और साहस की मिसाल पेश करता है। महर्षि वाल्मीकि की मूल रामायण से प्रेरित होकर तुलसीदास जी ने इसे सरल हिंदी में रचा, ताकि आम जनता भी इसे समझ सके और पाठ कर सके।

सुंदरकांड का नाम ही सुंदर है, क्योंकि इसमें हनुमान जी की हर क्रिया सुंदरता और शक्ति से ओतप्रोत है। आप जब सुंदरकांड का पाठ करते हैं, तो मानो हनुमान जी की ऊर्जा आपके भीतर प्रवेश कर जाती है। यह पाठ संकट मोचन हनुमान की भक्ति का प्रतीक है, जो जीवन के हर कष्ट को दूर करने में सहायक माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में इसे राम भक्ति का सार बताया गया है, जहां हनुमान जी की निस्वार्थ सेवा भावना हर किसी को प्रेरित करती है। अगर आप रोजाना या विशेष अवसरों पर इस पाठ को अपनाते हैं, तो आपके मन में आत्मविश्वास की एक नई लहर दौड़ती है।

ऐतिहासिक रूप से देखें, तो सुंदरकांड रामायण की उस घटना पर आधारित है जब हनुमान जी समुद्र लांघकर लंका पहुंचते हैं। यह हिस्सा न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। तुलसीदास जी की भाषा इतनी सरल और भावपूर्ण है कि आप इसे पढ़ते हुए खुद को राम कथा में खोया हुआ पाते हैं। कई विद्वान मानते हैं कि सुंदरकांड का पाठ रामचरितमानस के अन्य सोपानों से अलग इसलिए है, क्योंकि इसमें हनुमान जी मुख्य पात्र हैं, जो राम जी की सेवा में समर्पित हैं।

संपूर्ण सुंदरकांड पाठ

sunderkand ka paath (2)

सुंदरकांड को नियमित रूप से पढ़ना उत्तम है। यदि रोजाना संभव न हो, तो कम से कम मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ अवश्य पढ़े। यह रामचरितमानस का वह अंश है जो हनुमानजी की महानता का गुणगान करता है। इसके पाठ से मंगल ग्रह की प्रतिकूलता दूर होती है और शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है। साथ ही, यह जीवन की बाधाओं और कष्टों से छुटकारा दिलाता है। इसलिए हनुमान जयंती के अलावा इन दिनों में सुंदरकांड पढ़ना लाभकारी है। अब हनुमानजी का स्मरण करते हुए पाठ शुरू करते हैं।

सुंदरकांड पाठ से पहले करें हनुमानजी का ध्यान

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।

सुंदर कांड का पाठ आरंभ

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
छं0-कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बार्हिन्ह को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतुलित जोधा।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक मेकन्ह देखि रोधा।।2।।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल नाना बिधि बेसा।
नर स्रवन नासिका लोचन कटि पाय उर सिर सींग विशेषा।।
बिनु पद कर कच्छु सोहहिं परम बिकट बपु धरि बिचरही।
नाना भाँति की टोलीं करि करि एक एकन्ह सों लरहीं।।3।।
कहुं योगिन्ह मुनिसमाज करि करहिं योग जपध्यान।
कहुँ रून ससित्र ससस्त्र गिरि गहननि गढ किंनर गान।।
एहि बिधि देखत सकल पुर कपि लगे सुख दुख मान।
समुझि काज प्रभु प्रताप कपि पुनि हृदयँ हरष कपि भय त्याग।।4।।
दो0-नगरु रुचिरु रजनीचर कृत कोट रच्यो बर।
प्रभु प्रताप सागर महुँ तृन सम दुरग न गन्यो।।3।।

अथवा उर रखि रामु सीता दृढ़ करि काजु।
भय बिहीन कपि मन करि प्रबिसी नगरु माझु।।
भवन महल अट्ट सुभट्ट देखे बहु बिधि करि।
रामचंद्र जसु भयउ जगत कछु मरमु न परि।।
सोइ पुर प्रिय नहिं दुरजन कर सुलभ सब काल।
कपि केहिं कारन नहिं गयउ एहि रहस्य काल।।
सकल लोक त्रासद अति दारुन निसिचर।
देखि सकल अंग कपि हरष कपि हिय हर।।
सोचहिं मन हनुमंत किमि जियउँ राखि रामु।
सीता सुचि सुंदर सुजान सुखद सब भाँति।।
दो0-बहु द्वार दारुण दुखद दारिद दुरग दुखी।
राम राम रटु राम ही राम रटु राम ही।।4।।

रूप धरि कपि मनुज कीन्हा। तनु महँ राम नाम अंक कीन्हा।।
नगर फिरइ कपि रूप दिखावा। बालक जुवा बृद्ध सब पावा।।
सब सँग नारि रहे जेहि ठाऊँ। तहँ तहँ कपि गयउ तेहि काऊँ।।
असोक बाटिका तहँ देखी। सीता बैठी मन अति बेखी।।
त्रिजटा नाम राखसी एका। राम तेज बल बुद्धि बिसेका।।
सो कह सीता सों मम प्रीती। सुनु जननी मोहि देउ हिती।।
तासु बचन सुनि सीता रानी। बोली बचन बिनय बर बानी।।
कहु राखसि कस रामु दीन्हा। सुनतहि जस तस मोहि सुनाइन्हा।।
दो0-त्रिजटा उठि ताहि तब प्रनामु कीन्ह बहोरि।
चली ताहि लेहि जहँ राखे खल निसिचरि।।5।।

कपि तब असोक बाटिका आए। देखि मन हरष बिसमय बढ़ाए।।
कनक तरु सब फल विहीन। रत्न जटित बहु साँच बिहीन।।
पल्लव मानिक मरकत फूला। हरित तृन जंबुक सीत फूला।।
देखि सीता राम पग धरनी। चिंता सीता राम मन करनी।।
रूप मूरति राम सीता देखी। हरष बिसमय बढ़त मन लेखी।।
सीता सोच समुझि सब बाता। रामु रामु रटि रामु जपाता।।
कपि तब देखि सीता कै दसा। दुखी भयउ मन महुँ करि हसा।।
राम राम रटि राम ही राम। सीता सीत नयन जल धाम।।
सोचत सीता रामु दिन राती। कपि तब रूप धरि बन घाती।।
दो0- अंगद बाली सुत कपि बल बुद्धि निधान।
आयउ पवन तनुज तजि मन सीता ध्यान।।6।।

सीता मगन राम गुन गाना। कपि तेहि समय धरेउ बयाना।।
रामचंद्र गुन बरनन लागा। सीता करन परस परसागा।।
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। सीता हृदय हरष अनुमाए।।
कहा दोसु जेहि होइ निहोरा। मोरि जडता ते नहिं थोरा।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनतहि होइ मोरि सेवा लाजा।।
कपि के बचन सजन सुख दाए। सुनि मन हरष सीता पाए।।
कपि तब सीता निकट चलि आए। राम दूत मैं मातु जानि आए।।
जनकसुता तब दृष्टि निहारी। अंग अंग सुमंगल सारी।।
राम नाम मणि गन गहना। सीता मन हरष अनुमाना।।
दो0- मासपारायण, पहिला विश्राम
अनुज सहित तुम्ह प्रिय मोहि भारी।
नाथ कृपा करहु अब सारी।।7।।

कह कपि जय जय जय रघुराई। सेवक सुख दायक सुनु भाई।।
राम कृपा करि देखउँ आई। मोहि कहँ सकल सुख संपदाई।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम सखा सुग्रीव बुलावा। आयउँ देवि तुम्ह कहँ पावा।।
रामचंद्र कर सासन लेई। आयउँ देवि तुम्हरे हेई।।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
दो0- राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।8।।

सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।।
सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।।
दो0- राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।
जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।9।।

कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
दो0- राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।।10।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।।11।।

सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
दो0- माता मैं राम दूत आयउँ तुम्हरे पास।
रामु सोचत सीता दिन राति न पावत त्रास।।12।।

सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
दो0- सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
रामु रामु रटि रामु ही रामु रामु सोहि।।13।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।।14।।

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कपि तब देखी सीता कै दसा। दुखी भयउ मन महुँ करि हसा।।
राम राम रटि राम ही राम। सीता सीत नयन जल धाम।।
सोचत सीता रामु दिन राती। कपि तब रूप धरि बन घाती।।
अंगद बाली सुत कपि बल बुद्धि निधान।
आयउ पवन तनुज तजि मन सीता ध्यान।।
सीता मगन राम गुन गाना। कपि तेहि समय धरेउ बयाना।।
रामचंद्र गुन बरनन लागा। सीता करन परस परसागा।।
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। सीता हृदय हरष अनुमाए।।
कहा दोसु जेहि होइ निहोरा। मोरि जडता ते नहिं थोरा।।
दो0- रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनतहि होइ मोरि सेवा लाजा।
कपि के बचन सजन सुख दाए। सुनि मन हरष सीता पाए।।15।।

कपि तब सीता निकट चलि आए। राम दूत मैं मातु जानि आए।।
जनकसुता तब दृष्टि निहारी। अंग अंग सुमंगल सारी।।
राम नाम मणि गन गहना। सीता मन हरष अनुमाना।।
मासपारायण, दुसरा विश्राम
अनुज सहित तुम्ह प्रिय मोहि भारी।
नाथ कृपा करहु अब सारी।।
कह कपि जय जय जय रघुराई। सेवक सुख दायक सुनु भाई।।
राम कृपा करि देखउँ आई। मोहि कहँ सकल सुख संपदाई।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम सखा सुग्रीव बुलावा। आयउँ देवि तुम्ह कहँ पावा।।
रामचंद्र कर सासन लेई। आयउँ देवि तुम्हरे हेई।।
दो0- सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।16।।

सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
दो0- सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।
सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।।17।।

राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।
जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
दो0- सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।18।।

सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
दो0- कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।
कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।19।।

सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
दो0- माता मैं राम दूत आयउँ तुम्हरे पास।
रामु सोचत सीता दिन राति न पावत त्रास।20।।

सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
दो0- सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
रामु रामु रटि रामु ही रामु रामु सोहि।21।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।22।।

कपि तब देखी सीता कै दसा। दुखी भयउ मन महुँ करि हसा।।
राम राम रटि राम ही राम। सीता सीत नयन जल धाम।।
सोचत सीता रामु दिन राती। कपि तब रूप धरि बन घाती।।
अंगद बाली सुत कपि बल बुद्धि निधान।
आयउ पवन तनुज तजि मन सीता ध्यान।।
सीता मगन राम गुन गाना। कपि तेहि समय धरेउ बयाना।।
रामचंद्र गुन बरनन लागा। सीता करन परस परसागा।।
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। सीता हृदय हरष अनुमाए।।
कहा दोसु जेहि होइ निहोरा। मोरि जडता ते नहिं थोरा।।
दो0- रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनतहि होइ मोरि सेवा लाजा।
कपि के बचन सजन सुख दाए। सुनि मन हरष सीता पाए।23।।

कपि तब सीता निकट चलि आए। राम दूत मैं मातु जानि आए।।
जनकसुता तब दृष्टि निहारी। अंग अंग सुमंगल सारी।।
राम नाम मणि गन गहना। सीता मन हरष अनुमाना।।
मासपारायण, तिसरा विश्राम
अनुज सहित तुम्ह प्रिय मोहि भारी।
नाथ कृपा करहु अब सारी।।
कह कपि जय जय जय रघुराई। सेवक सुख दायक सुनु भाई।।
राम कृपा करि देखउँ आई। मोहि कहँ सकल सुख संपदाई।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम सखा सुग्रीव बुलावा। आयउँ देवि तुम्ह कहँ पावा।।
दो0- रामचंद्र कर सासन लेई। आयउँ देवि तुम्हरे हेई।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।24।।

कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
दो0- राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।25।।

सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।
सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।।
राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।
जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
दो0- सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।26।।

सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
दो0- रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।27।।

कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।
सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।।
राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।
जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
दो0- सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।28।।

राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
दो0- कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।29।।

राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
दो0- सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।
सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।30।।

राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।
जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
दो0- सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।31।।

सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
दो0- कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।
कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।32।।

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सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
दो0- कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।
माता मैं राम दूत आयउँ तुम्हरे पास।33।।

रामु सोचत सीता दिन राति न पावत त्रास।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
दो0- राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।34।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।35।।

सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
दो0- सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।36।।

सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।।
दो0- सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।
राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।37।।

जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
दो0- सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।38।।

सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
दो0- कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।
कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।39।।

सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
दो0- कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।
माता मैं राम दूत आयउँ तुम्हरे पास।40।।

रामु सोचत सीता दिन राति न पावत त्रास।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
दो0- राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।41।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।42।।

सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
दो0- सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।43।।

सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।।
दो0- सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।
राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।44।।

जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
दो0- सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।45।।

सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
दो0- कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।
कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।46।।

सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
दो0- कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।
माता मैं राम दूत आयउँ तुम्हरे पास।47।।

रामु सोचत सीता दिन राति न पावत त्रास।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
दो0- राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।48।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।49।।

सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
दो0- सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।50।।

सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।।
दो0- सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।
राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।51।।

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जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
दो0- सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।52।।

सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
दो0- कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।
कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।53।।

सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
दो0- कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।
माता मैं राम दूत आयउँ तुम्हरे पास।54।।

रामु सोचत सीता दिन राति न पावत त्रास।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
दो0- राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।55।।

सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
दो0- कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।
सुनु माता मोहि देउ अब आज्ञा आज्ञा जी।56।।

सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।
सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
दो0- सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।57।।

सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। राम लखन सीता सब भाए।।
राम सखा सुग्रीव सँग जाई। वन वसत सब दिन निकटाई।।
रामु सोचत सीता दिन राती। लखन सोचत रामु अघाती।।
सीता सोचत रामु अघारी। कपि तब बोले बचन विचारी।।
दो0- सुनु माता रामु दिन राती। सोचत सीता सुख नहिं पाती।
राम सत्य संकल्प प्रभु सब काल विदित।58।।

जानि कृपा करहु अब सरनागत हित।।
कह कपि माता मोहि अब आज्ञा देइ। रामु भेजि मोहि काहि भेइ।।
सीता तब कपि सों बोली। रामु रामु रटि रामु गोली।।
कपि तब रूप बिसाल देखावा। सीता मन हरष अनुमावा।।
राम नाम सुमिरन करि लागा। कपि तब रूप लघु करि भागा।।
सीता तब कपि सों कहलावा। रामु रामु रटि रामु बोलावा।।
कपि तब अंगूठी उतारी। सीता के चरनन धरि धारी।।
सीता तब अंगूठी पाई। रामु रामु रटि रामु जपाई।।
कपि तब बोले बचन सुहाए। रामु रामु रटि रामु भाए।।
दो0- सुनु माता मैं कपि हनुमाना। राम दूत मैं आयउँ ठाना।
राम कार्य हित जगत पति आयउँ देवि तोहि।59।।

सुनु जननी मोहि रामु देउ अब काजु सोहि।
सुनत बचन पद गहि समाना। रामु रामु रटि रामु जपाना।।
कपि तब उठि सीता उर लावा। राम राम रटि रामु बोलावा।।
सीता तब कपि सों बोली। राम काज कीन्हें किमि होली।।
राम चरन द्रढ़ बिश्वासा। करउँ सो सब कारज सासा।।
सुनु जननी मैं तुरतहिं जाई। रामु भेजि मोहि काहि भाई।।
सुनु सुत करि मातु सेवकाई। जिमि तनय मातु बोलाई।।
रामु भेजि मोहि काहि काजा। सुनु माता मोहि देउ राजा।।
कपि के बचन सुनत सीता रानी। बोली बचन राम गुन बानी।।
दो0- कहु कपि राम लखन बैदेही। कुशल कुसल दुख सुख सुख लेही।
कपि मैं राम दूत दूत मैं रामु रामु ही।60।।

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सुंदरकांड पाठ के लाभ

सुंदरकांड का पाठ आपकी आध्यात्मिक यात्रा को नई दिशा दे सकता है। जब आप इसे नियमित रूप से करते हैं, तो आपके मन में आत्मविश्वास की एक मजबूत दीवार खड़ी हो जाती है। नकारात्मक ऊर्जा दूर भागती है, और भक्ति की भावना आपके हृदय में बस जाती है। कई लोग बताते हैं कि इस पाठ से उनकी आंतरिक शांति बढ़ी है, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें हर चुनौती से लड़ने की ताकत दे रही हो। यह पाठ राम भक्ति को मजबूत करता है, और हनुमान जी की कृपा से आपका जीवन प्रकाशमय हो जाता है।

मानसिक और शारीरिक लाभों की बात करें, तो सुंदरकांड का पाठ तनाव को कम करने में चमत्कारिक साबित होता है। आपका ध्यान केंद्रित होता है, और दैनिक जीवन की छोटी-मोटी परेशानियां खुद-ब-खुद सुलझने लगती हैं। कुछ अनुभवी भक्त कहते हैं कि नियमित पाठ से सिरदर्द या अन्य छोटे रोगों से राहत मिलती है, क्योंकि हनुमान जी को रोग नाशक माना जाता है। लंबे समय तक पाठ करने से आपकी एकाग्रता बढ़ती है, जो कामकाज में सफलता दिलाती है। यह सब कुछ जादू जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह भक्ति की शक्ति है।

ज्योतिषीय दृष्टि से, सुंदरकांड का पाठ शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के प्रभाव को कम करने में मदद करता है। आपकी कुंडली में मौजूद दोष दूर होते हैं, और ग्रह-नक्षत्र आपके अनुकूल हो जाते हैं। राहु-केतु जैसे ग्रहों का भय समाप्त होता है, और जीवन में स्थिरता आती है। अगर आप ज्योतिष में विश्वास रखते हैं, तो इस पाठ को अपनाकर देखिए, कैसे आपके भाग्य के द्वार खुलते हैं। यह पाठ न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि ज्योतिषीय संतुलन भी लाता है।

दैनिक जीवन में, सुंदरकांड का पाठ संकटों से मुक्ति दिलाता है। आपकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, और सुख-समृद्धि आपके द्वार पर दस्तक देती है। घर में क्लेश कम होता है, और सकारात्मक वातावरण बनता है। चाहे नौकरी की तलाश हो या पारिवारिक समस्या, यह पाठ हर क्षेत्र में लाभ पहुंचाता है। आप इसे आजमाकर देखें, कैसे छोटी-छोटी खुशियां आपके जीवन को भर देती हैं।

सुंदरकांड पाठ की विधि

सुंदरकांड का पाठ शुरू करने से पहले, आपको कुछ आवश्यक सामग्री इकट्ठा करनी चाहिए। हनुमान जी की मूर्ति या चित्र, फूल, धूप, दीप, फल और अगरबत्ती जैसी चीजें जरूरी हैं। एक साफ-सुथरी जगह चुनें, जहां आप शांति से बैठ सकें। लाल कपड़ा बिछाकर चौकी सजाएं, और घी का दीपक जलाएं। ये छोटी-छोटी तैयारियां आपके पाठ को और प्रभावशाली बनाती हैं। अगर आपके पास रामचरितमानस की पुस्तक है, तो उसे सामने रखें।

पाठ करने का सही समय चुनना महत्वपूर्ण है। मंगलवार और शनिवार सबसे उत्तम दिन माने जाते हैं, क्योंकि ये हनुमान जी से जुड़े हैं। ब्रह्म मुहूर्त में पाठ करना विशेष फलदायी होता है। रविवार को भी आप इसे कर सकते हैं, लेकिन अमावस्या पर इससे बचें। शाम के समय पाठ न करें, क्योंकि रात्रि में ऊर्जा का प्रवाह अलग होता है। अगर आप सुबह जल्दी उठकर करते हैं, तो दिनभर की ऊर्जा सकारात्मक रहती है।

चरणबद्ध विधि से पाठ करें। सबसे पहले संकल्प लें—हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना बोलें। फिर हनुमान जी का ध्यान करें, और पाठ प्रारंभ करें। धीरे-धीरे पढ़ें, हर दोहे का अर्थ समझें। समापन पर आरती करें, और प्रसाद बांटें। यह पूरी प्रक्रिया सरल है, लेकिन भक्ति भाव से करनी चाहिए। आप अगर शुरुआती हैं, तो छोटे हिस्सों से शुरू करें।

सावधानियां रखें, जैसे शुद्ध मन से पाठ करें। उच्चारण सही रखें, और बीच में न उठें। अगर आप पीरियड्स में हैं, तो महिलाएं पाठ न करें। ये नियम पालन करने से पाठ का फल शीघ्र मिलता है। आप इन बातों का ध्यान रखकर, सुंदरकांड का पाठ को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं।

सुंदरकांड पाठ के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

सुंदरकांड का पाठ कितनी अवधि का हो, यह आपकी सुविधा पर निर्भर करता है। पूर्ण पाठ लगभग एक से दो घंटे लेता है, जबकि संक्षिप्त पाठ आधे घंटे में हो जाता है। समूह पाठ में और मजा आता है, क्योंकि सामूहिक ऊर्जा दोगुनी हो जाती है। आप परिवार के साथ मिलकर करें, तो घर में खुशहाली बढ़ती है। अगर समय कम है, तो मुख्य दोहों पर फोकस करें।

सामान्य गलतियां जैसे गलत उच्चारण या ध्यान भटकना, इनसे बचें। समाधान है—धीरे पढ़ें और अर्थ समझें। अगर मन भटकता है, तो हनुमान जी की मूर्ति पर नजर रखें। अभ्यास से ये समस्याएं दूर हो जाती हैं। आप अगर रोजाना थोड़ा-थोड़ा करें, तो एकाग्रता खुद-ब-खुद बढ़ेगी।

एफ.ए.क्यू (F.A.Q)

सुंदरकांड का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

आप इसे सप्ताह में कम से कम एक बार करें। अगर विशेष मनोकामना है, तो 21 दिन लगातार पाठ फायदेमंद होता है। दैनिक पाठ से जीवन में स्थिरता आती है।

क्या महिलाएं सुंदरकांड का पाठ कर सकती हैं?

हां, महिलाएं बेझिझक पाठ कर सकती हैं। बस मासिक धर्म के दौरान इससे बचें, ताकि पवित्रता बनी रहे। अन्यथा, कोई प्रतिबंध नहीं है।

सुंदरकांड पाठ से कितने समय में फल मिलता है?

फल भक्ति पर निर्भर करता है। कुछ को तुरंत राहत मिलती है, जबकि अन्य को कुछ हफ्तों में। नियमितता महत्वपूर्ण है।

क्या ऑनलाइन सुंदरकांड सुनना भी लाभदायक है?

बिल्कुल, ऑनलाइन सुनना भी फायदेमंद है। लेकिन खुद पढ़ने से ज्यादा प्रभाव पड़ता है। सुनते हुए ध्यान केंद्रित रखें।

सुंदरकांड और हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?

सुंदरकांड रामचरितमानस का हिस्सा है, जो हनुमान जी की कथा पर आधारित है। हनुमान चालीसा छोटी स्तुति है। दोनों ही शक्तिशाली हैं, लेकिन सुंदरकांड विस्तृत है।

समापन

सुंदरकांड का पाठ हनुमान जी की अपार शक्ति का सार है, जो आपके जीवन को संकटों से मुक्त कर सकता है। आप इसे अपनाकर देखें, कैसे सकारात्मक बदलाव आते हैं। दैनिक जीवन में भक्ति को स्थान दें, और हनुमान जी की कृपा से हर चुनौती पर विजय पाएं। याद रखें, सच्ची भक्ति ही सफलता की कुंजी है।