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Ekadashi Vrat Katha in Hindi: महत्व, पूजा विधि, नियम और सभी 24 एकादशियों की पूरी जानकारी

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ekadashi vrat katha in hindi

अगर आप ekadashi vrat katha in hindi पढ़ना या सुनना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है। यहाँ आपको एकादशी की उत्पत्ति कथा, पूजा विधि, व्रत के नियम, सभी 24 एकादशियों के नाम और उनका महत्व — सब कुछ विस्तार से मिलेगा।

एकादशी व्रत क्या होता है?

एकादशी तिथि का अर्थ

संस्कृत में “एकादश” का अर्थ होता है ग्यारह। हिंदू पंचांग के अनुसार, हर महीने दो पक्ष होते हैं — शुक्ल पक्ष (चंद्रमा की बढ़ती कला) और कृष्ण पक्ष (चंद्रमा की घटती कला)। हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को “एकादशी” कहा जाता है। इस तरह हर महीने दो एकादशी आती हैं।

यह तिथि केवल एक धार्मिक दिन नहीं है — यह आत्मशुद्धि, उपवास और भगवान के प्रति समर्पण का दिन है। इस दिन मन को शांत करके भगवान विष्णु की आराधना की जाती है।

एकादशी और भगवान विष्णु का संबंध

एकादशी का व्रत सीधे भगवान विष्णु (श्रीहरि) से जुड़ा हुआ है। जैसे देवताओं में विष्णु सर्वश्रेष्ठ हैं, नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार व्रतों में एकादशी को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है। पुराणों में लिखा है — “एकादशी के समान कोई व्रत नहीं है।”

इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना, व्रत-उपवास और कथा श्रवण किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान श्रीहरि अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

साल में कितनी एकादशियाँ आती हैं?

सामान्यतः एक साल में 24 एकादशियाँ होती हैं। जब अधिक मास (लीप मंथ) आता है, तो यह संख्या 26 तक पहुँच जाती है। हर एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना विशेष फल है।

एकादशी व्रत का महत्व

धार्मिक महत्व — पाप नाश और मोक्ष की प्राप्ति

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि एकादशी व्रत करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वैकुण्ठधाम की प्राप्ति कराने वाला, भोग और मोक्ष दोनों देने वाला — ऐसा कोई दूसरा व्रत नहीं है। यह व्रत केवल इस जन्म के नहीं, बल्कि पिछले जन्मों के पापों को भी धो देता है।

पद्म पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत करता है, उसे मृत्यु के बाद सीधे भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ में स्थान मिलता है। यही इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता है।

क्यों कहते हैं एकादशी को सभी व्रतों का राजा?

सभी व्रतों और सभी दानों से अधिक फल एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है। इस तिथि को जो भी दान किया जाए, जो भी भजन-पूजन हो — वह सब भगवान श्रीहरि को अर्पित होकर पूर्ण फलदायी बन जाता है। जैसे गंगा स्नान से पाप धुलते हैं, वैसे ही एकादशी व्रत आत्मा को पवित्र करता है।

इसीलिए इसे “व्रतों का राजा” कहा जाता है। इस दिन किया गया प्रत्येक पुण्य कार्य हजारों गुना बढ़ जाता है।

एकादशी व्रत के आध्यात्मिक लाभ

  • जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति
  • मोक्ष की प्राप्ति और वैकुण्ठ में स्थान
  • पितरों की आत्मा को शांति मिलती है
  • मन की एकाग्रता और आत्मबल में वृद्धि
  • परिवार में सुख, शांति और समृद्धि
  • भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है

एकादशी व्रत कथा — उत्पत्ति की कहानी

एकादशी व्रत कथा इन हिंदी पढ़ने से पहले यह जानना जरूरी है कि यह व्रत शुरू कैसे हुआ। इसकी उत्पत्ति की कहानी बड़ी रोचक और प्रेरणादायक है।

मुरासुर राक्षस और भगवान विष्णु की कथा

प्राचीन काल में “मुर” नाम का एक भयंकर राक्षस था। उसने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। देवता उससे परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने मुर राक्षस से युद्ध किया। यह युद्ध बहुत लंबा चला। युद्ध करते-करते भगवान थक गए और एक गुफा में विश्राम करने लगे।

मुर राक्षस ने इस अवसर का लाभ उठाकर सोते हुए विष्णु पर वार करने की कोशिश की। तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई — एक देवी। उस देवी ने मुर राक्षस का वध कर दिया।

जब भगवान विष्णु जागे और यह सब देखा, तो उन्होंने उस देवी से प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। तब उस देवी ने कहा — “भगवान! जो भी आपका भक्त इस तिथि को व्रत रखे, उसके सभी पाप नष्ट हों और उसे मोक्ष की प्राप्ति हो।”

एकादशी देवी की उत्पत्ति कैसे हुई?

वह दिव्य शक्ति जो भगवान विष्णु के शरीर से प्रकट हुई थी — वही “एकादशी” कहलाई। यह एकादशी तिथि पर प्रकट हुई थी, इसलिए इस तिथि को उन्हीं का नाम दिया गया। भगवान विष्णु ने उस देवी को वरदान दिया कि इस तिथि पर उनका (विष्णु का) पूजन किया जाएगा और व्रत रखने वालों को मोक्ष मिलेगा।

उत्पन्ना एकादशी — व्रत की शुरुआत कब और क्यों?

मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को “उत्पन्ना एकादशी” कहते हैं। यही वह तिथि है जब एकादशी देवी का प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिए एकादशी व्रत की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है। जो नए भक्त एकादशी व्रत शुरू करना चाहते हैं, उन्हें इसी उत्पन्ना एकादशी से आरंभ करने की सलाह दी जाती है।

प्रमुख एकादशी व्रत कथाएँ

वैसे तो हर एकादशी की अपनी अलग कथा है, लेकिन कुछ एकादशियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। आइए उनकी संक्षिप्त कथाएँ जानते हैं।

निर्जला एकादशी कथा (ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष)

महाभारत काल की बात है। भीम बहुत खाने वाले थे। वे एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे क्योंकि भूख सहना उनके लिए असंभव था। तब वेदव्यास जी ने उन्हें उपाय बताया — साल में केवल एक बार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को पानी भी न पीते हुए निर्जल व्रत करो। इस एक व्रत का पुण्य सभी 24 एकादशियों के बराबर होगा। तब से इसे “निर्जला एकादशी” या “भीमसेनी एकादशी” कहते हैं। यह व्रत सबसे कठिन लेकिन सबसे अधिक फलदायी माना जाता है।

देवशयनी एकादशी कथा (आषाढ़ शुक्ल पक्ष)

राजा मान्धाता के राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। राजा ने ऋषि अंगिरस से उपाय पूछा। ऋषि ने कहा — “आषाढ़ शुक्ल एकादशी को विधिपूर्वक व्रत करो।” राजा ने पूरे राज्य में यह व्रत करवाया और भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। खूब वर्षा हुई, अकाल समाप्त हुआ और राज्य में फिर से खुशहाली आई। इसी दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं — इसीलिए इसे देवशयनी कहते हैं।

कामदा एकादशी कथा (चैत्र शुक्ल पक्ष)

रत्नपुर नाम का एक सुंदर राज्य था जहाँ गंधर्व और अप्सराएं निवास करती थीं। ललिता और ललित नाम के दो प्रेमी दंपत्ति थे। एक बार ललित को राजा पुंडरीक के दरबार में नृत्य करते समय अपनी पत्नी की याद आ गई और उससे गलती हुई। राजा ने क्रोधित होकर उसे राक्षस बना दिया। तब ललिता ने पुंडरीक क्षेत्र (मथुरा) में जाकर श्री विष्णु भगवान के समक्ष कामदा एकादशी का व्रत किया। उस व्रत के पुण्य से उसके पति को शाप मुक्ति मिली। यह कथा बताती है कि एकादशी व्रत शाप से भी मुक्ति दिला सकता है।

मोक्षदा एकादशी कथा (मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष)

राजा वैखानस के पिता नरक में पड़े थे। राजा ने स्वप्न में अपने पिता को पीड़ित देखा। तब पर्वत ऋषि ने बताया कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (मोक्षदा एकादशी) का व्रत करो और उसका फल अपने पिता को अर्पित करो। राजा ने ऐसा ही किया। उस पुण्य से उनके पिता को नरक से मुक्ति मिली और वे वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए। यह एकादशी पितृ-मोक्ष के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी कथा (कार्तिक शुक्ल पक्ष)

देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु जब क्षीरसागर में सो जाते हैं, तब चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी पर वे जागते हैं। इसी को “देवउठनी एकादशी” या “प्रबोधिनी एकादशी” कहते हैं। इस दिन तुलसी विवाह होता है और सभी शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि पुनः आरंभ हो जाते हैं। यह दिन चातुर्मास की समाप्ति का प्रतीक है। इस दिन जागरण करना और व्रत रखना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

साल की सभी 24 एकादशियों के नाम और महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में आने वाली सभी 24 एकादशियों का अपना-अपना नाम और विशेष फल है। नीचे संपूर्ण सूची दी गई है।

शुक्ल पक्ष की एकादशियाँ

माह एकादशी का नाम विशेष फल
चैत्र शुक्ल कामदा एकादशी सभी कामनाएं पूर्ण, शाप मुक्ति
वैशाख शुक्ल मोहिनी एकादशी माया व मोह से मुक्ति
ज्येष्ठ शुक्ल निर्जला एकादशी सभी 24 एकादशियों का फल एक साथ
आषाढ़ शुक्ल देवशयनी एकादशी चातुर्मास आरंभ, विष्णु शयन
श्रावण शुक्ल पुत्रदा/पवित्रा एकादशी संतान सुख की प्राप्ति
भाद्रपद शुक्ल अजा/परिवर्तिनी एकादशी पापों से मुक्ति
आश्विन शुक्ल पापांकुशा एकादशी पापों पर अंकुश, मोक्ष
कार्तिक शुक्ल देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी विष्णु जागरण, शुभ कार्य आरंभ
मार्गशीर्ष शुक्ल मोक्षदा एकादशी पितृ मोक्ष, गीता जयंती
पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी पुत्र प्राप्ति का वरदान
माघ शुक्ल जया एकादशी प्रेत योनि से मुक्ति
फाल्गुन शुक्ल आमलकी एकादशी आँवले की पूजा, दीर्घायु

कृष्ण पक्ष की एकादशियाँ

माह एकादशी का नाम विशेष फल
चैत्र कृष्ण पापमोचिनी एकादशी घोर पापों से मुक्ति
वैशाख कृष्ण वरूथिनी एकादशी दुर्भाग्य से रक्षा
ज्येष्ठ कृष्ण अपरा एकादशी ब्रह्महत्या जैसे पापों का नाश
आषाढ़ कृष्ण योगिनी एकादशी रोग व शोक से मुक्ति
श्रावण कृष्ण कामिका एकादशी सभी इच्छाओं की पूर्ति
भाद्रपद कृष्ण अजा / अन्नदा एकादशी हरिश्चंद्र की तरह पाप नाश
आश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी पितरों को यमलोक से मुक्ति
कार्तिक कृष्ण रमा एकादशी सुख, समृद्धि और पाप नाश
मार्गशीर्ष कृष्ण उत्पन्ना एकादशी एकादशी व्रत की उत्पत्ति तिथि
पौष कृष्ण सफला एकादशी सभी कार्यों में सफलता
माघ कृष्ण षट्तिला एकादशी तिल दान का विशेष महत्व
फाल्गुन कृष्ण विजया एकादशी युद्ध व कठिनाई में विजय

अधिक मास की एकादशियाँ (Adhik Maas Ekadashi)

जब हिंदू पंचांग में अधिक मास आता है (लगभग हर 3 साल में एक बार), तब दो अतिरिक्त एकादशियाँ आती हैं — परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) और पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष)। इन दोनों का विशेष महत्व है और इन्हें करने से दरिद्रता दूर होती है।

एकादशी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि

एकादशी व्रत की पूजा विधि जानना बेहद जरूरी है — क्योंकि बिना सही विधि के व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। यहाँ स्टेप बाय स्टेप सब कुछ बताया गया है।

दशमी (Dashami) से ही शुरू होती है तैयारी

एकादशी व्रत की तैयारी वास्तव में एक दिन पहले यानी दशमी तिथि से ही शुरू हो जाती है। दशमी के दिन शाम को एक ही बार सात्विक भोजन करना चाहिए। रात को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। मन में शुद्ध विचार रखें और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए सोएं।

एकादशी के दिन की पूजा विधि — स्टेप बाय स्टेप

  1. सूर्योदय से पहले उठें — ब्रह्म मुहूर्त में जागकर स्नान करें। पवित्र जल में गंगाजल मिलाना शुभ रहता है।
  2. व्रत का संकल्प लें — स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने खड़े होकर व्रत का संकल्प बोलें। “मैं आज एकादशी का व्रत करता/करती हूँ, हे भगवान विष्णु! मुझे आशीर्वाद दें।”
  3. पूजन स्थल तैयार करें — पीला या सफेद कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु की मूर्ति या शालिग्राम स्थापित करें।
  4. पंचोपचार पूजा करें — जल, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से भगवान की पूजा करें। तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं — यह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
  5. एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें — उस दिन की विशेष एकादशी की कथा पढ़ें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
  6. शाम को आरती करें — संध्या आरती करें, भजन गाएं और रात्रि जागरण करने का प्रयास करें। यह अत्यंत पुण्यकारी होता है।
  7. द्वादशी को पारण करें — अगले दिन (द्वादशी तिथि) में ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराने के बाद ही स्वयं व्रत खोलें।

पूजन सामग्री की पूरी लिस्ट

एकादशी पूजा के लिए आवश्यक सामग्री:

भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र · शालिग्राम जी · तुलसी के पत्ते · पीले फूल (विशेषतः गेंदा या कमल) · पीली चंदन · धूप और दीपक · घी का दीप · फल (केला, आम) · पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) · पीला वस्त्र · जनेऊ · कलश · गंगाजल

व्रत का पारण (Parana) कैसे करें?

एकादशी व्रत का पारण यानी व्रत खोलना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्रत रखना। पारण हमेशा द्वादशी तिथि में करना चाहिए। पारण का सही समय सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले का होता है। सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, ब्राह्मण या गरीब को भोजन कराएं, फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पारण में तुलसी का सेवन जरूर करें।

ध्यान रखें — अगर द्वादशी तिथि में ही हरिवासर हो, तो उस समय पारण नहीं करना चाहिए। पारण का समय पंचांग से देखकर ही तय करें।

एकादशी व्रत के नियम — क्या करें और क्या न करें

व्रत रखते समय ये 5 बातें जरूर याद रखें

  • एकादशी के दिन चावल बिल्कुल न खाएं — यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है। शास्त्रों में चावल खाना वर्जित माना गया है।
  • सात्विक भोजन करें — फलाहार, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़ा, आलू, मखाना जैसी चीजें खा सकते हैं।
  • झूठ न बोलें, क्रोध न करें — एकादशी के दिन मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहना अनिवार्य है।
  • भगवान विष्णु का नाम जपते रहें — “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरि ॐ” का जाप करें।
  • रात्रि जागरण करने का प्रयास करें — एकादशी की रात जागकर भजन-कीर्तन करना अत्यंत शुभ है।

एकादशी के दिन किन चीज़ों से बचें?

करें ✓: तुलसी जल पीएं · फलाहार करें · विष्णु नाम जपें · कथा सुनें · दान करें · ब्राह्मण भोजन कराएं

न करें ✗: चावल न खाएं · मांस-मदिरा से बचें · बाल न कटवाएं · क्रोध न करें · झूठ न बोलें · ब्रह्मचर्य भंग न करें

कौन लोग एकादशी व्रत रख सकते हैं?

एकादशी व्रत सभी वर्गों के लिए खुला है — पुरुष, महिला, बच्चे, बूढ़े, गृहस्थ और संन्यासी — सभी इसे कर सकते हैं। गर्भवती महिलाएं, बीमार व्यक्ति और छोटे बच्चे पूर्ण उपवास की जगह फलाहार करके भी व्रत का फल पा सकते हैं। नीयत और श्रद्धा ज्यादा मायने रखती है।

एकादशी व्रत के फायदे

आध्यात्मिक फायदे

एकादशी व्रत का सबसे बड़ा फल आध्यात्मिक है। इस व्रत से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है। यमराज के दूत उस व्यक्ति को नहीं छूते जो नियमित एकादशी व्रत करता है। मृत्यु के बाद सीधे वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और कुल का उद्धार होता है।

शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

उपवास का शरीर पर गहरा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महीने में दो बार उपवास करने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है, शरीर के विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और मन शांत होता है। आधुनिक विज्ञान भी इंटरमिटेंट फास्टिंग के फायदों को मानता है। एकादशी व्रत में चावल न खाने का नियम भी पाचन के लिए लाभदायक है।

एकादशी का व्रत और मोक्ष की प्राप्ति

पुराणों में स्पष्ट कहा गया है — जो व्यक्ति जीवनभर एकादशी का व्रत करता है, उसे मोक्ष यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। यह सिर्फ एक धार्मिक मान्यता नहीं — यह भगवान विष्णु का स्वयं दिया हुआ वरदान है। इसीलिए इसे “मोक्षदायिनी” व्रत भी कहा जाता है।

एकादशी व्रत कथा सुनने और पढ़ने का महत्व

कथा श्रवण से मिलने वाला पुण्य

शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी व्रत कथा सुनने मात्र से वही फल मिलता है जो हजारों अश्वमेध यज्ञ करने से मिलता है। कथा सुनने से मन पवित्र होता है, भक्ति भाव बढ़ता है और भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। इसीलिए हर एकादशी पर उस दिन की विशेष कथा जरूर पढ़ें या सुनें।

घर में कथा का पाठ करते समय परिवार के सभी सदस्यों को एकत्र होना चाहिए। इससे पूरे परिवार को पुण्य मिलता है।

किस समय पढ़ें एकादशी व्रत कथा?

एकादशी व्रत कथा पढ़ने का सबसे उत्तम समय है — प्रातःकाल पूजा के बाद या दोपहर के समय। कथा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके पढ़नी चाहिए। कथा के समय धूपबत्ती जलाएं और तुलसी के पास बैठकर पाठ करें। रात को भी कथा पढ़ी जा सकती है — विशेषकर जागरण के दौरान।

Wrapping Up

एकादशी व्रत हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली व्रत है। यह सिर्फ एक उपवास नहीं — यह आत्मशुद्धि, भक्ति और मोक्ष का मार्ग है। हर महीने दो बार आने वाली यह तिथि आपको भगवान विष्णु के करीब ले जाती है।

एकादशी व्रत कथा इन हिंदी पढ़ना और सुनना — दोनों ही पुण्यकारी हैं। जब आप इस व्रत को सही विधि, सच्ची श्रद्धा और पूरे नियमों के साथ करते हैं, तो इसका फल निश्चित रूप से मिलता है। चाहे आप पहली बार व्रत कर रहे हों या सालों से कर रहे हों — हर बार यह व्रत आपको नई ऊर्जा और दिव्य आशीर्वाद देता है।

तो इस एकादशी से ही संकल्प लें — भगवान श्रीहरि की भक्ति में डूबें, व्रत रखें, कथा सुनें और वैकुण्ठ धाम का रास्ता प्रशस्त करें।

🙏 जय श्री हरि — हरि ओम तत्सत्

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1. एकादशी व्रत कब से शुरू करना चाहिए?

एकादशी व्रत शुरू करने का सबसे शुभ दिन मार्गशीर्ष मास की उत्पन्ना एकादशी है — क्योंकि इसी दिन से एकादशी व्रत की परंपरा शुरू हुई थी। हालाँकि आप किसी भी एकादशी से शुरुआत कर सकते हैं। संकल्प लेकर शुरू करना जरूरी है।

Q2. एकादशी व्रत में क्या खाया जाता है?

एकादशी व्रत में चावल बिल्कुल नहीं खाते। फलाहार में केला, सेब, ककड़ी, आलू, साबूदाना, मखाना, दूध, दही, घी, शकरकंद, सिंघाड़ा आटा — ये सब खाए जा सकते हैं। निर्जला व्रत में पानी भी नहीं पीते।

Q3. निर्जला एकादशी और सामान्य एकादशी में क्या फर्क है?

सामान्य एकादशी में फलाहार और जल ग्रहण किया जा सकता है। निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) में न अन्न, न जल — पूर्णतः निर्जल व्रत रखा जाता है। इस एक व्रत का पुण्य सभी 24 एकादशियों के बराबर माना जाता है।

Q4. क्या महिलाएं एकादशी का व्रत रख सकती हैं?

हाँ, बिल्कुल। महिलाएं एकादशी व्रत पूर्ण श्रद्धा के साथ रख सकती हैं। गर्भवती महिलाएं या जो महिलाएं मासिक धर्म में हों, वे फलाहार करके या मन से व्रत करके भी फल पा सकती हैं।

Q5. एकादशी का पारण कब और कैसे करें?

व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद करना चाहिए। पारण के समय पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, ब्राह्मण या निर्धन को भोजन कराएं, तुलसी दल का सेवन करें, फिर स्वयं भोजन करें।

Q6. एकादशी व्रत में तुलसी क्यों जरूरी है?

तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। एकादशी के दिन तुलसी चढ़ाने और तुलसी जल पीने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। बिना तुलसी के विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है।

Q7. साल में कुल कितनी एकादशियाँ होती हैं?

सामान्य वर्ष में 24 एकादशियाँ होती हैं — हर महीने 2 (शुक्ल और कृष्ण पक्ष में)। जब अधिक मास आता है तो 2 और बढ़कर कुल 26 एकादशियाँ हो जाती हैं।